Sunday, February 2, 2014


                    हर्फ छेनी-हथौड़ी से



मैं मुसाफिर था गुमनाम चलता रहा

आपके प्यार में दिल बहलता रहा

 

मैं उजालों का पैगाम लेकर चला

आँधियों में दिया बनकर जलता रहा

 

मेरी मिहनत को नाकामियाँ क्यों मिली

होम करने में क्यों हाथ जलता रहा

 

हर्फ छेनी-हथौड़ी से अनगिन लिखे

हाथ की ख़म लकीरें बदलता रहा

 

मैं खतावार बनकर जिऊँ किसलिए

इस अना के लिए दम निकलता रहा

 

कौन मेहनत करे किसको सुहरत मिले

देख अन्याय यह दिल दहलता रहा

 

भूल जाना मिरी खामियाँ दोस्तो

फिर मिलूँगा अगर दम ये चलता रहा

 

विप्लवी’ कामयाबी उसी का है हक़

जो गिरा और गिरकर सँभलता रहा

Thursday, January 2, 2014

             मंगल कामनाएँ


फिर कम हुआ इक और  साल  राहे सफ़र से
कब तक बचें  मंजि़ल पर पहुँच जाने के डर से
हमको  ही जब चलने  का सलीक़ा  नहीं आया
क्या करते शिकायत  भला इस  राह-गुज़र  से
इस  दौर में  सम्मान से जीना  है चुनौती
गर्दन को  बचाते हैं तो  पगड़ी  गिरे सर से
हर जीव के सुख-दुख  से हों बावस्ता ‘विप्लवी’
रौशन  हो  नया  साल  इसी  नूरे-नज़र  से

की मंगल कामनाओं
  के साथ -

                       विप्लवी परिवार