मंगल कामनाएँ
फिर कम हुआ इक और साल राहे सफ़र से
कब तक बचें मंजि़ल पर पहुँच जाने के डर से
हमको ही जब चलने का सलीक़ा नहीं आया
क्या करते शिकायत भला इस राह-गुज़र से
इस दौर में सम्मान से जीना है चुनौती
गर्दन को बचाते हैं तो पगड़ी गिरे सर से
हर जीव के सुख-दुख से हों बावस्ता ‘विप्लवी’
रौशन हो नया साल इसी नूरे-नज़र से
की मंगल कामनाओं
के साथ -
विप्लवी परिवार
कब तक बचें मंजि़ल पर पहुँच जाने के डर से
हमको ही जब चलने का सलीक़ा नहीं आया
क्या करते शिकायत भला इस राह-गुज़र से
इस दौर में सम्मान से जीना है चुनौती
गर्दन को बचाते हैं तो पगड़ी गिरे सर से
हर जीव के सुख-दुख से हों बावस्ता ‘विप्लवी’
रौशन हो नया साल इसी नूरे-नज़र से
की मंगल कामनाओं
के साथ -
विप्लवी परिवार