ग़ज़ल
नन्हीं नन्हीं
गुडि़याएँ
बाँस बराबर
पीड़ाएँ
कुलटा साध्वी-पतिव्रता
शोषण की
परिभाषाएँ
रोने से मिट
जाती हैं
किस्मत की सब
रेखाएँ
अलिखित
रुक्मिनियों के दुःख
पढ़ी
लिखी हैं राधाएँ
रामराज आने को है
सहमी सी
हैं सीताएँ
दो
दुखियारिन दुःख बाँटे
छिन
रोयें, छिन मुस्काएँ
इंसानो पर
भारी हैं
मज़्हब की
मर्यादाएँ
आँसू की
बरसातों में
जी के
मैल निकल जाएँ
हँसना
गुल की फितरत है
काँटो से
क्या घबराएँ
साझा
दुःख किरदार अलग
बेटी बहन
बहू माँएँ
चली ‘विप्लवी’ की मैयत
बस जि़न्दा
पीछे आएँ
No comments:
Post a Comment