Wednesday, December 18, 2013

नन्हीं नन्हीं गुडि़याएँ


       ग़ज़ल

नन्हीं   नन्हीं   गुडि़याएँ
बाँस   बराबर  पीड़ाएँ

कुलटा   साध्वी-पतिव्रता
शोषण    की   परिभाषाएँ

रोने  से  मिट जाती हैं
किस्मत  की  सब रेखाएँ

अलिखित रुक्मिनियों के दुःख
पढ़ी लिखी हैं राधाएँ

रामराज  आने को है
सहमी  सी  हैं  सीताएँ

दो दुखियारिन दुःख बाँटे
छिन रोयें, छिन मुस्काएँ

इंसानो  पर  भारी  हैं
मज़्हब  की  मर्यादाएँ

आँसू की बरसातों में
जी के मैल निकल जाएँ


हँसना गुल की फितरत है
काँटो से क्या घबराएँ

साझा दुःख किरदार अलग
बेटी   बहन    बहू  माँएँ

चली विप्लवी की मैयत

बस  जि़न्दा  पीछे  आएँ

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